कहाँ तो तय था Summary In Hindi

The poet of ghazal ‘Kahan to tay tha’ is Dushyant Kumar. in this the poet has given expression to human suffering. The poet has described both pessimistic and positive ideology. Even after independence, the general public is main a life of poverty. The primary desires of lifestyles: food, clothing and refuge are not being provided nicely to the commonplace man.

कहाँ तो तय था Summary In Hindi

कहाँ तो तय था जीवन-परिचय

दुष्यन्त कुमार त्यागी का जन्म 1 सितम्बर, सन् 1933 को उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले के राजपुर-नवादा में एक अच्छे खाते-पीते घराने में हुआ। इनकी शिक्षा मुजफ्फरनगर, नहरौर तथा इलाहाबाद से हुई। छात्र जीवन से ही लिखना आरम्भ कर दिया था परन्तु इलाहाबाद इनकी वास्तविक साहित्यिक जन्मभूमि इनके पिता जी इन्हें वकील बनाने या पुलिस की नौकरी करने के लिए कहते रहे परन्तु ये रचनाधर्मी थे तो इन्होंने अपना आजीविका साधन साहित्य को बना लिया। इन्होंने कई जगह नौकरियां की परन्तु रेडियो की नौकरी पसंद आई थी। दिल्ली रेडियो में स्क्रिप्ट लेखक का काम करते रहे। सन् 1966 में पदोन्नति प्राप्त कर भोपाल चले गए। वे प्रायः कहते थे कि वे किसी की नौकरी नहीं करते, वे तो कलम की नौकरी करते हैं। वे भोपाल के साहित्यिक-जंगल के शेर कहलाते थे। इसी शहर में रहते हुए इन्हें उनकी गज़ल के कारण विशेष पहचान मिली। 30 दिसम्बर, सन् 1975 को मात्र बयालीस वर्ष की अल्पायु में इनका देहांत हो गया।

दुष्यन्त कुमार बारह वर्ष की अवस्था में लिखने लगे थे। सूर्य का स्वागत’ (1957) काव्य संग्रह से उन्हें पहचान मिली। फिर सन् 1975 तक उनके तीन संग्रह प्रकाश में आए ‘आवाजों के घेरे,’ ‘जलते हुए बन का बसन्त’ तथा ‘साये में धूप’ नाटक के क्षेत्र में उनका योग अविस्मरणीय है। ‘एक कण्ठ विषदायी बहुचर्चित नाट्य काव्य है। इनकी प्रतिभा एकाधिक विधाओं में प्रस्फुटित हुई है और सभी में इन्होंने ज़मीन तोड़ी है। इनकी रचनाओं में आम आदमी की पीड़ा उसकी विवशता है। गजल लेखन में इन्हें विशेष ख्याति मिली है।

कहाँ तो तय था का सारांश

‘कहाँ तो तय था’ गज़ल के कवि दुष्यन्त कुमार हैं। इसमें कवि ने मानवीय पीड़ा को अभिव्यक्ति दी है। कवि ने निराशा और आशावादी दोनों विचारधारा का वर्णन किया है। आजादी के बाद भी आम जनता बदहाली का जीवन व्यतीत कर रही है। जीवन की मूल आवश्यकताः रोटी, कपड़ा और मकान तीनों आम आदमी को ठीक ढंग से नहीं मिल रहे हैं। आज भी आदमी भूखे पेट, नंगे तन सो रहा है परन्तु कवि को आशा है कि एक दिन अवश्य ही आम आदमी में जागरूकता आएगी और वह अपनी आवश्यकताओं के लिए आवाज उठाएगा। मानव, मानव से प्रेम करना सीख जाएगा। इसके लिए उसे इकट्ठे होकर प्रयत्नशील रहना चाहिए।

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