मैं और मेरा देश निबंध Summary In Hindi

Main Aur Mera Desh Nibandh”, the author may discuss various aspects of their country, such as its culture, history, traditions, achievements, challenges, and their personal experiences and feelings towards it. The essay may also reflect the author’s patriotism, pride, and sense of belonging to their nation.

मैं और मेरा देश Summary In Hindi

मैं और मेरा देश लेखक परिचय

शरी कन्हैया लाल मिश्र ‘प्रभाकर’ आधुनिक युग के प्रमुख गद्य लेखक हैं। उनका जन्म सन् 1906 में सहारनपुर जिले के देवबन्द ग्राम में हुआ था। प्रभाकर जी की रुचि सामाजिक कार्यों में थी, जिसके परिणामस्वरूप वे राष्ट्रीय आंदोलन में भी बढ़-चढ़ कर भाग लेने लगे। आप सद्वृत्तियों एवं सामाजिक तथा राष्ट्रीय भावनाओं को जगाने वाले लेखक हैं। पत्रकारिता में आपकी विशेष रुचि है। आपने विकास, ज्ञानोदय तथा नया जीवन जैसी लोकप्रिय पत्रिकाओं का सम्पादन तथा संचालन किया।

प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित हैं-
रेखाचित्र- नई पीढ़ी नए विचार, ज़िंदगी मुस्कराई, माटी हो गई सोना। निबंध संग्रह-बाजे पायलिया के धुंघरू। लघु कथा संग्रह-आकाश के तारे, धरती के फूल। संस्मरणात्मक रेखाचित्र-दीप जले, शंख बजे । रिपोर्ताज-क्षण बोले, कण मुस्काए, महके आंगन चहके द्वार।

इनकी रचनाओं पर इनके व्यक्तित्व की स्पष्ट छाप है। व्यावहारिक पक्ष की प्रबलता ने इनकी रचनाओं को प्रभावशाली बना दिया है। व्यंग्यात्मक शैली के कारण इनकी रचनाओं में रोचकता का समावेश है। इनकी रचनाएँ देशभक्ति की भावना से परिपूर्ण हैं। इनके साहित्य में देशभक्ति का स्वर सुनाई देता है। इनकी भाषा सरल तथा व्यावहारिक है।

मैं और मेरा देश पाठ का सारांश

‘मैं और मेरा देश’ शीर्षक निबंध के रचयिता श्री कन्हैया लाल मिश्र ‘प्रभाकर’ हैं। इस निबंध के माध्यम से उन्होंने पराधीन देश और स्वाधीन देश का अंतर स्पष्ट करते हुए देश-प्रेम की शिक्षा दी है। एक नागरिक के रूप में जहां हमारे अधिकार हैं वहां कुछ कर्त्तव्य भी हैं। इन दोनों के बीच में समन्वय की ज़रूरत है।

पराधीनता का दर्द-लेखक की मान्यता है कि वह अपने घर में जन्मा, पला और आस-पड़ोस में खेल-कूद कर बड़ा हुआ है। अपने नगर के लोगों से मिलजुल कर उनका सम्मान करते हुए उनसे सम्मान पाता रहा है। वह सदा एकदूसरे के काम आया है तथा अन्य भी उसकी सहायता करते रहे हैं। इस प्रकार उसे लगता था कि वह पूर्ण रूप से संतुष्ट व्यक्ति है, किंतु एक दिन उसके इस आनंद में बाधा पड़ गयी जब उसे यह पता चला कि पराधीन व्यक्ति की स्थिति बड़ी हीन होती है। इसका पता लेखक को लाला लाजपतराय द्वारा व्यक्त किए गए अनुभव से चला।

लाला जी का अनुभव यह था, ‘मैं अमेरिका गया, इंग्लैंड गया, फ्रांस गया और संसार के दूसरे देशों में भी घूमा, पर जहां भी मैं गया भारतवर्ष की गुलामी की लज्जा का कलंक मेरे माथे पर लगा रहा।’ इस कथन ने लेखक को झकझोर दिया। वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि जब तक देश स्वतंत्र नहीं तब तक सब प्रकार की सुख-सुविधाएं व्यर्थ हैं। नागरिक को कोई भी ऐसा कार्य नहीं करना चाहिए जिससे उसके देश की स्वतंत्रता अथवा देश के सम्मान को धक्का पहुंचे। नागरिक भी देश के सम्मान का अधिकारी है।

देश का गौरव कैसे बढ़ायें-हर एक व्यक्ति अपने देश के गौरव को बढ़ाने में अपना योगदान दे सकता है। यह सोचना कि एक व्यक्ति देश के लिए क्या कर सकता है, गलत ढंग से सोचना है। जहां युद्ध में लड़ने वालों का महत्त्व है वहां युद्ध में सामग्री पहुंचाने वालों तथा उस सामग्री का उत्पादन करने वालों का भी महत्त्व है। किसान खेती न उपजाए तो रसद पहुंचाने वाले क्या कर सकते हैं? इतना ही नहीं, युद्ध में जय बोलने वालों का भी महत्त्व होता है।

‘जय’ का नारा सुनकर लड़ने वालों में जोश और उत्साह का भाव तीव्र होता है, जिससे वे अपनी सामर्थ्य से भी अधिक काम कर दिखाते हैं। दर्शकों की तालियां खिलाड़ियों को उत्साहित करती हैं। कवि सम्मेलनों तथा मुशायरों की अधिकांश सफलता तारीफ करने वालों पर निर्भर करती है। अतः साधारण-से-साधारण नागरिक अपने देश के लिए बहुत कुछ कर सकता है। कहावत प्रसिद्ध है कि ‘अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता।’ पर इतिहास इस बात का साक्षी है कि अनेक बार अकेले व्यक्ति ने भी बहुत बड़ा चमत्कार कर दिखाया है।

देशभक्ति का उदाहरण-एक बार महान् संत स्वामी रामतीर्थ जापान गए। वे रेल में यात्रा कर रहे थे। एक दिन उन्हें खाने के लिए फल न मिले। उन दिनों वे फलाहारी थे। फल न मिलने पर उनके मुँह से निकला-‘जापान में शायद अच्छे फल नहीं मिलते।’ एक जापानी युवक ने स्वामी जी की यह बात सुन ली। वह युवक अपनी पत्नी को रेल में बिठाने आया था। वह दौड़ कर कहीं दूर से फलों का ताज़ा टोकरा लेकर आया और स्वामी जी को भेंट कर दिया। स्वामी जी ने उसे उन फलों का मूल्य देना चाहा पर उस युवक ने कहा-‘आप इनका मूल्य देना ही चाहते हैं तो वह यह है कि आप अपने देश में जाकर किसी से यह न कहिएगा कि जापान में अच्छे फल नहीं मिलते।’ युवक के इस देशप्रेम ने स्वामी जी का मन मोह लिया।

देश को कलंकित करने का उदाहरण- एक अन्य घटना भी सुनिए-किसी दूसरे देश का निवासी एक युवक जापान में शिक्षा प्राप्त करने के लिए गया। उसने एक सरकारी पुस्तकालय की एक पुस्तक में से कुछ दुर्लभ चित्र निकाल लिये। किसी जापानी युवक ने उसकी इस हरकत को देख लिया। उसने पुस्तकालयाध्यक्ष को इसकी सूचना दे दी। पुलिस ने उस विद्यार्थी के कमरे की तलाशी ली और चित्र प्राप्त कर लिए। उस विद्यार्थी को जापान से निकाल दिया गया। उस विद्यार्थी के अपराध ने अपने सारे देश को बदनाम कर दिया। पुस्तकालय के बाहर बोर्ड पर लिख दिया गया कि उस देश का कोई निवासी इस पुस्तकालय में प्रवेश नहीं कर सकता।

कमालपाशा की महानता-इससे स्पष्ट है कि एक व्यक्ति की अच्छाई जहां देश को ऊंचा उठाती है वहां उसकी चरित्रहीनता पूरे देश के गौरव को हानि भी पहुंचाती है। लेखक का अनुभव है कि अच्छी भावना से किया गया छोटेसे-छोटा कार्य भी देश के लिए लाभकारी होता है। कमालपाशा अपने देश तुर्की के राष्ट्रपति थे। राजधानी में उनकी वर्षगांठ का उत्सव मनाया गया। उत्सव की समाप्ति पर जब वे अपने कक्ष में पहुंचे तो उस समय एक बूढ़ा वर्षगांठ का उपहार लेकर आया। राष्ट्रपति को इसकी सूचना भेजी गई।

वह बूढ़ा तीस मील की दूरी से पैदल चल कर आया था। राष्ट्रपति विश्राम के वस्त्रों में ही नीचे आए। उन्होंने बूढ़े किसान का उपहार स्वीकार किया। यह उपहार मिट्टी की हंडिया में पाव-भर शहद था। कमालपाशा ने उस हांडी को खोला। दो उंगलियां शहद की चाटीं। तीसरी उंगली शहद भर कर बूढ़े के मुँह में दे दी। बूढ़ा धन्य हो गया। इतना ही नहीं राष्ट्रपति ने उस उपहार को सर्वोत्तम उपहार बताया। बूढे को राष्ट्रपति की शाही कार में शाही सम्मान के साथ उसके गाँव भेज दिया गया।

नेहरू जी की सरलता-हमारे देश में भी एक किसान ने रंगीन सूतलियों से एक खाट बुनी और उसे अपने कन्धों पर उठा कर प्रधानमंत्री श्री जवाहर लाल नेहरू की कोठी में पहुंचा और पंडित जी से उस खाट को स्वीकार करने की प्रार्थना की। पंडित जी ने उस खाट वाले की भावना का इतना सम्मान किया कि उसे अपने दस्तखत से युक्त अपनी एक फोटो भेंट में दे दी।

हम कैसे कार्य करें-हम जो भी काम करें वह देश के अनुकूल हों। कभी भी और किसी भी स्थान पर अपने देश की निन्दा नहीं करनी चाहिए और न ही अपने देश को दूसरे देशों से हीन समझना चाहिए। अपने देश की निंदा करना अथवा उसे हीन कहना अपने देश के शक्ति-बोध को भयंकर चोट पहुंचाना है। इससे देश के सामूहिक मानसिक बल को चोट पहुंचती है। शल्य महाबली कर्ण का सारथि था। जब कभी कर्ण अपने पक्ष की विजय की घोषणा करता तभी वह (शल्य) अर्जुन की अजेयता का उल्लेख भी कर देता। इस तरह उसने कर्ण के आत्म-विश्वास में दरार डाल दी। इस दरार ने कर्ण की पराजय की नींव डाल दी।

मतदान अवश्य करें-सफ़ाई की ओर उचित ध्यान देना, किसी सार्वजनिक स्थान को गंदा न करना भी देश-भक्ति का एक रूप है। यदि हम चाहते हैं कि अपने देश का सब काम ढंग से चल सके तो हम अपने मत का उचित प्रयोग करें। अतः प्रत्येक नागरिक का यह कर्त्तव्य है कि जब भी कोई चुनाव हो वह अपने मत का महत्त्व समझे और यह मान कर चले कि उनके मत को प्राप्त किए बिना महान्-से-महान् व्यक्ति भी अधिकारी नहीं बन सकता। इस विचार से हम अपने देश को ऊँचा उठा सकते हैं।

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