मित्रता Summary In Hindi

Mitrata” in English means “friendship,” emphasizing the importance of companionship and the connection between individuals who share a close and meaningful relationship as friends. It represents the relationship and bond between friends, characterized by trust, mutual affection, camaraderie, and support.

मित्रता Summary In Hindi

मित्रता लेखक परिचय

आचार्य रामचंद्र शुक्ल का जन्म बस्ती जिले के ‘अगोना’ नामक ग्राम में सन् 1889 ई० में हुआ था। इनकी शिक्षा मिर्जापुर में हुई। इन्होंने सन् 1901 में मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण की थी। इसके बाद विपरीत परिस्थितियों के कारण ये आगे पढ़ नहीं पाए थे। कुछ समय के लिए इन्होंने मिर्जापुर के मिशन स्कूल में चित्रकला के अध्यापक पद पर कार्य किया। सन् 1908 में नागरी प्रचारिणी सभा में इन्हें ‘हिंदी शब्द सागर’ के सहकारी संपादक के रूप में नियुक्त किया गया। इन्होंने काफ़ी समय तक ‘नागरी प्रचारिणी पत्रिका’ का संपादन किया। कुछ समय तक ये काशी विश्वविद्यालय में हिंदी के प्राध्यापक रहे और सन् 1937 में बाबू श्यामसुंदर दास के अवकाश ग्रहण करने पर हिंदी-विभाग के अध्यक्ष नियुक्त किये गये। सन् 1941 में काशी में इनका देहावसान हो गया।

रचनाएँ– आचार्य शुक्ल ने कविता, कहानी, अनुवाद, निबंध, आलोचना, कोष-निर्माण, इतिहास-लेखन आदि अनेक क्षेत्रों में अपनी अपूर्व प्रतिभा का परिचय दिया है। इनकी सर्वाधिक ख्याति निबंध-लेखक और आलोचक के रूप में हुई है। इनकी प्रमुख रचनाएँ-हिंदी-साहित्य का इतिहास, जायसी ग्रंथावली, तुलसीदास, सूरदास, चिंतामणि (तीन भाग), रस-मीमांसा आदि हैं। सन् 1903 ई० में रचित इनकी कहानी ‘ग्यारह वर्ष का समय’ हिंदी की प्रारंभिक कहानियों में उल्लेखनीय है। इनके द्वारा रचित चिंतामणि के तीनों भाग इनकी मृत्यु के बाद छपे थे।

शुक्ल जी के निबंध हिंदी- साहित्य की अनुपम निधि हैं। अनुभूति और अभिव्यंजना की दृष्टि से उनके निबंध उच्चकोटि के हैं। इनमें गंभीर विवेचन के साथ-साथ गवेषणात्मक चिंतन का मणि-कांचन संयोग, निर्धांत-अनुभूति के साथ-साथ प्रौढ़ अभिव्यंजना का अद्भुत मिश्रण, लेखक के गंभीर व्यक्तित्व के साथ-साथ विषय-प्रतिपादन की प्रौढ़ता का औदार्य, विचार-शक्ति के स्वस्थ संघटन के साथ-साथ भाव-व्यंजना का वैचित्र्यपूर्ण माधुर्य तथा जीवन की विविध रसात्मक अनुभूतियों के साथ-साथ जगत् की विविध रहस्यपूर्ण गतिविधियों का अनोखा चमत्कार मिलता है।

मित्रता पाठ का सार

‘मित्रता’ आचार्य रामचंद्र शुक्ल द्वारा लिखित एक विचारात्मक निबंध है। लेखक का विचार है कि यों तो मेल-जोल से मित्रता बढ़ जाती है किंतु सच्चे मित्र का चुनाव एक कठिन समस्या है। नवयुवकों को यदि अच्छा मित्र मिल जाए तो उनका जीवन सफल हो सकता है क्योंकि संगत का प्रभाव हमारे आचरण पर पड़ता है तथा हमारा जीवन अपने मित्रों के संपर्क से बहुत अधिक प्रभावित होता है। इसलिए लेखक ने मित्र के चुनाव, मित्र के लक्षण आदि का विवेचन इस निबंध में किया है।

युवा व्यक्ति की मानसिक स्थिति-लेखक का विचार है कि जब कोई युवा व्यक्ति अपने घर से बाहर निकलकर संसार में प्रवेश करता है तो उसे सबसे पहले अपना मित्र चुनने में कठिनाई का अनुभव होता है। प्रारंभ में वह बिल्कुल अकेला होता है। धीरे-धीरे उसकी जान-पहचान का घेरा बढ़ने लगता है जिनमें से उसे अपने योग्य उचित मित्र का चुनाव करना पड़ता है। मित्रों के उचित चुनाव पर उसके जीवन की सफलता निर्भर करती है, क्योंकि संगति का प्रभाव हमारे आचरण पर भी पड़ता है।

युवावस्था कच्ची मिट्टी के समान होती है जिसे कोई भी आकार प्रदान किया जा सकता है। सही मित्र की मित्रता ही हमें जीवन में उन्नति प्रदान करती है। केवल हँसमुख व्यक्तित्व से संपन्न मनुष्य को, बिना उसके गण-दोष परखे, मित्र बना लेना उचित नहीं है। हमें मित्र बनाते समय मैत्री के उद्देश्य पर भी विचार करना चाहिए क्योंकि मित्रता एक ऐसा साधन है जिससे आत्मशिक्षा का कार्य आसान हो जाता है। विश्वासपात्र मित्र हमें उत्तमतापूर्वक जीवन निर्वाह करने में सहायता देते हैं। ऐसी ही मित्रता करने का प्रयत्न प्रत्येक युवा व्यक्ति को करना चाहिए।

छात्रावस्था की मित्रता-प्राय: छात्रावस्था के युवकों में मित्रता की धुन सवार रहती है। मित्रता उनके हृदय से उमड़ पड़ती है। उनके हृदय से मित्रता के भाव बात-बात में उमड़ पड़ते हैं। युवा पुरुषों की मित्रता स्कूल के बालक की मित्रता से दृढ़, शांत और गंभीर होती है। वास्तव में, सच्चा मित्र जीवन संग्राम का साथी होता है। सुंदर-प्रतिभा, मन-भावनी चाल तथा स्वच्छंद तबीयत आदि दो-चार गुण ही मित्रता के लिए पर्याप्त नहीं हैं। सच्चा-मित्र पथ-प्रदर्शक के समान होना चाहिए, जिस पर हम पूरा विश्वास कर सकें। वह भाई के समान होना चाहिए जिसे हम अपना प्रेम-पात्र बना सकें।

भिन्न स्वभाव के लोगों में मित्रता-दो भिन्न प्रकृति, व्यवसाय और रुचि के व्यक्तियों में भी मित्रता हो सकती है। राम-लक्ष्मण तथा कर्ण और दुर्योधन की मित्रता परस्पर विरोधी प्रकृति के होते हुए भी अनुकरणीय है। वस्तुत: समाज में विभिन्नता देखकर ही लोग परस्पर आकर्षित होते हैं तथा हम चाहते हैं कि जो गुण हममें नहीं हैं, उन्हीं गुणों से युक्त मित्र हमें मिले। इसीलिए चिंतनशील व्यक्ति प्रफुल्लित व्यक्ति को मित्र बनाता है। निर्बल बलवान् को अपना मित्र बनाना चाहता है।

मित्र का कर्तव्य-लेखक एक सच्चे मित्र के कर्तव्यों के संबंध में बताता है कि वह उच्च और महान् कार्यों में अपने मित्र को इस प्रकार सहायता दे कि वह अपनी निजी सामर्थ्य से भी अधिक कार्य कर सके। इसके लिए हमें आत्मबल से युक्त व्यक्ति को अपना मित्र बनाना चाहिए। संसार के अनेक महान् पुरुष मित्रों के द्वारा प्रेरित किए जाने पर ही बड़े-बड़े कार्य करने में समर्थ हुए हैं। सच्चे मित्र उचित मंत्रणा के द्वारा अपने मित्र का विवेक जागृत करते हैं तथा उसे स्थापित करने में सहायक होते हैं। संकट और विपत्ति में उसे पूरा सहारा देते हैं। जीवन और मरण में सदा साथ रहते हैं।

मित्र के चुनाव में सावधानी-लेखक मित्र के चुनाव में सतर्कता का व्यवहार करने पर बल देता है क्योंकि अच्छे मित्र के चुनाव पर ही हमारे जीवन की सफलता निर्भर करती है। जैसी हमारी संगत होगी, वैसे ही हमारे संस्कार भी होंगे, अतः हमें दृढ़ चरित्र वाले व्यक्तियों से मित्रता करनी चाहिए। मित्र एक ही अच्छा है, अधिक की आवश्यकता नहीं होती। इस संबंध में लेखक ने बेकन के कथन का उदाहरण दिया है कि “समूह का नाम संगत नहीं है। जहाँ प्रेम नहीं है, वहाँ लोगों की आकृतियाँ चित्रवत् हैं और उनकी बातचीत झाँझ की झनकार है।” अत: जो हमारे जीवन को उत्तम और आनंदमय करने में सहायता दे सके ऐसा एक मित्र सैंकड़ों की अपेक्षा अधिक श्रेष्ठ है।

किन लोगों से मित्रता न करें-लेखक ऐसे लोगों से दूर रहने के लिए कहता है जो हमारे लिए कुछ नहीं कर सकते, न हमें कोई अच्छी बात बता सकते हैं, न हमारे प्रति उनके मन में सहानुभूति है और न ही वे बुद्धिमान् हैं । लेखक की मान्यता है कि आजकल हमें मौज-मस्ती में साथ देने के लिए अनेक व्यक्ति मिल सकते हैं जो संकट में हमारे निकट भी नहीं आयेंगे, ऐसे लोगों से कभी मित्रता नहीं करनी चाहिए।

जो नवयुवक मनचलों के समान केवल शारीरिक बनावश्रृंगार में लगे रहते हैं, महफिलें सजाते हैं, सिगरेट का धुआँ उड़ाते हुए गलियों में ठट्टा मारते हैं, उनका जीवन शून्य, निःसार और शोचनीय होता है। वे अच्छी बातों के सच्चे आनंद से कोसों दूर रहते हैं। उन्हें प्राकृतिक अथवा मानवीय सौंदर्य के स्थान पर केवल इंद्रिय-विषयों में ही लिप्त रहना अच्छा लगता है। उसका हृदय नीच आशाओं तथा कुत्सित विचारों से परिपूर्ण रहता है। लेखक इस प्रकार के व्यक्तियों से सावधान रहते हुए इनसे मित्रता न करने पर बल देता है।

कुसंग का ज्वर-लेखक ने कुसंग को एक भयानक ज्वर का नाम दिया है जो केवल नीति और सद्वृत्ति का नाश नहीं करता, अपितु बुद्धि का भी क्षय करता है। बुरे व्यक्ति की संगत अथवा मित्रता करने वाला व्यक्ति दिन-प्रतिदिन अवनति के गड्ढे में ही गिरता जायेगा। अतः बुरे व्यक्तियों की संगत से सदा बचना चाहिए। इस संबंध में लेखक एक उदाहरण देता है कि इंग्लैंड के एक विद्वान् को युवावस्था में राज दरबारियों में स्थान नहीं मिला तो वह जीवन-भर अपने भाग्य को सराहता ही रहा। बहुत-से लोग तो इसे अपना बड़ा भारी दुर्भाग्य समझते, पर वह अच्छी तरह जानता था कि वहाँ वह बुरे लोगों की संगत में पड़ता जो उसकी आध्यात्मिक उन्नति में बाधक होते। इसी कारण वह राज-दरबारी न बनकर स्वयं को सौभाग्यशाली समझता था।

बुरी आदतों का आकर्षण-लेखक के विचार में बुरी आदतें तथा बुरी बातें प्राय: व्यक्तियों को अपनी ओर शीघ्रता से आकर्षित कर लेती हैं। अतः ऐसे लोगों से कभी भी मित्रता नहीं करनी चाहिए जो अश्लील, अपवित्र और फूहड़ रूप से तुम्हारे जीवन में प्रवेश करना चाहते हैं, क्योंकि यदि एक बार व्यक्ति को इन बातों अथवा कार्यों में आनंद आने लगेगा तो बुराई अटल भाव धारण कर उसमें प्रवेश कर जायेगी। व्यक्ति की भले-बुरे में अंतर करने की शक्ति भी नष्ट हो जायेगी तथा विवेक भी कुंठित हो जाता है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति बुराई का भक्त बन जाता है। स्वयं को निष्कलंक रखने के लिए समस्त बुराइयों से बचना आवश्यक है क्योंकि-

“काजल की कोठरी में कैसो ही सयानों जाय।
एक लीक काजल की लागि है पै लागि है।”

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